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साना साना हाथ जोड़ि | Sana Sana Hath Jodi Summary

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साना साना हाथ जोड़ि | Sana Sana Hath Jodi Summary

 

प्रस्तावना-लेखिका मधु कांकरिया ने अपने यात्रा वृतांत में गंगटोक से लेकर हिमालय तक की यात्रा में प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन के साथ उन दृश्यों को भी हुआ है जिनमें विषम परिस्थितियों में पुरुष और महिलाएं जीवन संघर्ष में लगी रहती हैं। इस पाठ में लेखिका के सहदया होने का पता चलता है क्योंकि उसका मन प्रकृति की मनोहारी छटा देखने से अधिक जोखिम भरे कार्यों को करती हुई महिलाओं की ओर देखने में लगता है।

 

गंगटोक शहर-लेखिका को गंगटोक शहर देखकर ऐसा लगा कि आसमान की सुंदरता नीचे बिखर गई है और सारे तारे नीचे बिखर कर टिमटिमा रहे हैं। बादशाहों का एक ऐसा शहर जिसका सुबह, शाम, रात सब कुछ सुंदर था। सुबह होने पर एक प्रार्थना होंठों को छूने लगी-साना-साना हाथ जोड़ि, गर्दहु प्रार्थना हाम्रो जीवन तिम्रो कोसेली (छोटे-छोटे हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रही हूँ कि मेरा सारा जीवन अच्छाइयों को समर्पित हो) लेखिका ने प्रार्थना के ये बोल आज सुबह ही एक नेपाली युवती से सीखे थे।

 

सुबह यूमयांग के लिए निकलना था, किंतु आँख खुलते ही बालकनी की ओर भागी थी, क्योंकि लोगों ने बताया था कि यदि मौसम साफ हो तो बालकनी से ही हिमालय की सबसे ऊंची चोटी कंचनजंघा दिखाई देती है। किंतु पिछले वर्ष की तरह ही आज भी आसमान हल्के-हल्के बादलों में ढका था। कंचनजंघा तो नहीं दिखाई दी किंतु तरह-तरह के इतने सारे रंग-बिरंगे फूल दिखाई दिए कि लगा कि फूलों के बाग में आ गई है।

 

यूमथांग गंगटोक से 149 कि.मी. दूर था जिसके बारे में ड्राइवर जितेन नागें बता रहा था कि सारे रास्ते में हिमालय की गहनतम घाटियों और फूलों से लदी वादियों मिलेंगी और लेखिका उससे पूछने लगी थी- क्या वहीं बर्फ मिलेगी?

 

यूमथांग तक का रास्ता-यूमयांग के रास्ते में शांति और अहिंसा के प्रतीक रूप में एक कतार में लगी सफेद रंग की 108 मंत्र लिखी पताकाएँ दिखाई दीं। इनके बारे में नागें ने बताया यहाँ बुद्ध की बड़ी मान्यता है। जब भी किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु होती है, तो उसकी आत्मा की शांति के लिए शहर से दूर किसी पवित्र स्थान पर ये 108 पताकाएँ फहरा दी जाती हैं। इन्हें उत्तारा नहीं जाता है। अपने-आप धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं। कई बार नए कार्य की शुरुआत में भी ऐसी पताकाएँ लगा दी जाती हैं। पर वे रंगीन होती हैं। नार्गे बोले जा रहा था किंतु लेखिका नार्गे की जीप में लगी दलाई लामा की तसवीर की ओर देखे जा रही थी। उसने ऐसी दलाई लामा की तसवीरें दुकानों पर भी टेंगी देखी थीं।

 

रास्ते में कवी-लॉग स्टॉक पड़ा। जहाँ ‘गाइड’ फिल्म की शूटिंग हुई थी। यहाँ स्थानीय जातियों के बीच चले सुदीर्घ झगड़ों के बाद शांति बार्ता और संधि-पत्र के बारे में बताया। आगे बढ़े। रास्ते में एक कुटिया में घूमते हुए धर्म चक्र के बारे में बताया कि यह प्रेअर व्हील है। इसको घुमाने से सारे पाप धुल जाते हैं। धीरे-धीरे ऊंचाई की ओर बढ़ रहे थे। कार्य करते हुए नेपाली युवक-युवतियाँ और छोटे-छोटे घर दिखाई दे रहे थे और हिमालय विराट रूप में दिखाई दे रहा था। दर्शकों यात्रियों का काम्य हिमालय, पल-पल परिवर्तित हिमालय हिमालय बड़ा होते-होते विशालकाय होने लगा। भीमकाय पर्वतों के बीच और घाटियों के ऊपर बने संकरें रास्तों से गुजरते ऐसा लग रहा था कि रंग-बिरंगे फूल मुस्करा रहे हों और हम किसी सघन हरियाली वाली गुफा के बीच हिचकोले खाते निकल रहे हों।

 

इस असीम बिखरी सुंदरता को देख सैलानी झूम-झूम गा रहे थे “सुहाना सफर और ये मौसम हंसी…।” किंतु लेखिका एक ऋषि की तरह शांत थी वह सारे दृश्य को अपने भीतर भर लेना चाहती थी वह जीप की खिड़की से आसमान को छूती हुई पर्वत शिखरों को देखती, कभी चाँदी की तरह चमकती तिस्ता नदी के सौंदर्य को देखती कभी शिखरों के भी शिखर से गिरते हुए झरने ‘सेवन सिस्टर्स वॉटर फॉल’ को देखती जिसके सौंदर्य को सैलानी अपने-अपने कैमरों में कैद कर रहे थे।

 

लेखिका ने जीप से उतरकर किसी राजकुमारी-सी एक पत्थर के ऊपर बैठ बहती जलधारा में पाँव डुबाया और भीतर तक भीग गई मन काव्यमय हो उठा, सत्य और सौंदर्य को छूने लगा लेखिका को लगा कि उन अद्भुत क्षणों में जीवन की शक्ति का अहसास हो रहा है। में स्वयं भी देश और काल की सरहदों से दूर बहती धारा बन बहने लगी हूँ। भीतर की सारी तामसिकताएँ और दुष्ट वासनाएँ इस निर्मल धारा में बह गई हैं। इतने में नार्गे ठेलने लगा, आगे इससे भी सुंदर नजारे मिलेंगे।

 

लेखिका अनमनी-सी उठी और थोड़ी देर बाद वैसे ही नजारे आत्मा और आंखों को सुख देने वाले नजारे लेखिका को आश्चर्य हो रहा था कि पल भर में ब्रह्मांड में कितना कुछ घटित हो रहा था कि सतत् प्रवाहमान झरने, नीचे बहती हुई तिस्ता नदी, ऊपर मंडराते आवारा बादल, मद्धिम हवा में हिलोरे लेते हुए फूल, सब अपनी-अपनी लय में बहते हुए चरवेति-चैरवेति। यह देख लेखिका को एहसास हुआ कि जीवन का आनंद है यही चलायमान सौंदर्य इस सौंदर्य को देखकर उसे लगा कि में सचमुच ईश्वर के निकट हूँ और

 

सुबह सीखी हुई प्रार्थना फिर होंठों को छूने लगी-साना-साना हाथ जोड़ि…

 

मातृत्व और श्रम साधना का दृश्य यकायक लेखिका के मन से सौंदर्य की छटा छिटक गई। ऐसे छिटक गई कि मानो नृत्यांगना के नूपुर के अचानक टूट गए हों उसने देखा कि पहाड़ी औरतें पत्थरों पर बैठी पत्थर तोड़ रही हैं। गूंथे आटे-सी कोमल काया परंतु हाथों में कुदाल और हथीड़े कईयों की पीठ पर बँधी डोको (बड़ी टोकरी) में उनके बच्चे भी बँधे हुए थे। कुछ कुदाल को भरपूर ताकत के साथ जमीन पर मार रही थीं।

 

इतने स्वर्गीय सौंदर्य के बीच भूख, मीत, दैन्य और जिंदा रहने का यह जंग मातृत्व और श्रम-साधना साथ-साथ यहीं खड़े बी.आर.ओ. के 1 कर्मचारी से लेखिका ने पूछा- यह क्या हो रहा है। उसने बताया कि जिन रास्तों से गुजरते आप हिमशिखरों से टक्कर लेने जा रही है। उन्हीं रास्तों को ये पहाड़िने चौड़ा बना रही हैं।

 

‘बड़ा खतरनाक कार्य होगा यह लेखिका के कहने पर उसने कहा पिछले महीने तो एक की जान चली गई जरा-सी चूक और सीधी पाताल प्रवेश तभी लेखिका को सिक्किम सरकार द्वारा लिखे बोर्ड की याद आई जिस पर लिखा था (आप ताज्जुब करेंगे पर इन रास्तों की बनाने में लोगों ने मीत को झुठलाया है) यह याद कर लेखिका का मानसिक चैनल बदल गया उसे पलामू और गुमला के जंगलों की याद आ गई उसने वहीं देखा था कि पीठ पर बच्चे को कपड़े से बांधकर पत्तों की तलाश में वन-वन डोलती आदिवासी युवतियों उन आदिवासी युवतियों के फूले हुए पाँव और इन पत्थर तोड़ती हुई पहाड़िनों के हाथों में पड़ी गाँठे दोनों एक ही कहानी कहते हैं कि आम जिंदगी की कहानी हर जगह एक-सी है कि सारी मलाई एक तरफ, सारे आँसू, अभाव, यातना और वंचना एक तरफ

 

तभी उन्हें गमगीन देखकर जितेन नार्गे ने कहा- मैडम यह मेरे देश की आम जनता है। इन्हें तो आप कहीं भी देख लेंगी। आप इन्हें नहीं पहाड़ों की सुंदरता को देखिए जिसके लिए आप इतने पैसे खर्च करके आई हैं।” किंतु लेखिका मन-ही-मन सोच रही थी कि ये देश की आम जनता नहीं है, जीवन का संतुलन भी हैं। ये कितना कम लेकर समाज को कितना अधिक वापस लौटा देती हैं। तभी लेखिका ने देखा कि वे श्रम सुंदरियाँ किसी बात पर खिलखिलाकर हंस पड़ीं और ऐसा लगा कि जीवन लहरा उठा हो, सारा खंडहर ताजमहल बन गया हो।

 

स्कूल से लौटते पहाड़ी बच्चे-लेखिका लगातार ऊंचाइयों की ओर बढ़ रही थी। रास्ते में स्कूल से लौटते पहाड़ी बच्चे मिले जिनके बारे में नागें बता रहा था यहाँ का जीवन कठोर है यहाँ एक ही स्कूल है। दूर-दूर से बच्चे उसी स्कूल में जाते हैं। इस स्कूल में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे अपनी माँओं के साथ काम करते हैं। आगे बढ़ते जा रहे थे खतरा भी बढ़ता ही जा रहा था। रास्ते सैंकरे होते जा रहे थे। रास्ते में जगह-जगह लिखी हुई चेतावनियाँ खतरों के प्रति सजग कर रही थीं।

 

चाय के बागानों में युवतियों सूरज ढल रहा था, उसी समय पहाड़ी औरतें गाएँ चराकर वापस लौट रही थीं। कुछ लड़कियों के सिर लकड़ियों के भारी गट्ठर थे। आसमान बादलों से घिरा था उतरती संध्या में जीप अब चाय के बागानों से गुजर रही थी। वहाँ दृश्य देखा कि चाय के भरे-भरे बागानों में कई युवतियों बोलू (सिक्किम-परिधान) पहने हुए चाय की पत्तियाँ तोड़ रही थीं। नदी की तरह उफान लेता यीवन और श्रम से दमकता गुलाबी चेहरा और डूबते सूर्य की इंद्रधनुषी छटा को देखकर मंत्रमुग्ध-सी लेखिका चीख पड़ी युवतियों का अधिक सौंदर्य लेखिका के लिए असहय था।

 

लायुंग में पड़ाव-गगनचुंबी पहाड़ों के नीचे साँस लेती एक छोटी-सी बस्ती लायुंग तिस्ता नदी के तीर पर लकड़ी के बने घर में ठहरे। में अपनी सुस्ती दूर करने के उद्देश्य से हाथ-मुँह धोकर तिस्ता नदी के किनारे पत्थरों पर बैठ गई। वातावरण में अद्भुत शांति, आखें भर आई। लेखिका ने अनुभव किया कि ज्ञान का नन्हा सा बोधिसत्व जैसे भीतर उगने लगा। वहीं सुख शांति है, सुकून है जहाँ अखंडित संपूर्णता है-पेड़-पौधे, पशु, पक्षी और आदमी सब अपनी-अपनी लय, ताल और गति में हैं। आज की पीढ़ी ने प्रकृति की इस लय, ताल और गति से खिलवाड़ कर अक्षम्य अपराध किया है।

 

अँधेरा होने से पहले तिस्ता नदी की धार तक पहुँची लकड़ी के बने छोटे से गेस्ट हाऊस में रुके। रात गहराने लगी। जितेन ने गाना शुरू कर दिया। एक-एक कर सभी सैलानी गोल-गोल घेरा बनाकर नाचने लगे लेखिका की पचास वर्षीया सहेली कुमारियों को भी मात करती हुई नाचने लगी, जिसे देखकर लेखिका अवाक् रह गई। लायुंग की सुबह वह टहलने निकली बर्फ की तलाश थी। कहीं बर्फ नहीं मिली। घूमते हुए सिक्किमी नवयुवक ने बताया कि बढ़ते प्रदूषण

 

के कारण स्नो-फॉल लगातार कम होती जा रही है। 500 फीट ऊंचाई पर कटाओ’ में बर्फ मिल जाएगी। कटाओ’ की ओर सफर शुरू किया। बादलों को चीरती हुई खतरनाक रास्तों पर जीप आगे बढ़ रही थी। जगह-जगह चेतावनिया लिखी हुई थीं। सबकी साँसे रुकी हुई। कटाओ के करीब पहुँचे। नार्गे ने बताया कि कटाओ हिंदुस्तान का स्विट्जरलैंड है। आगे बढ़ने पर चारों ओर

 

साबुन के झाग की तरह गिरी हुई बर्फ दिखी। सभी सैलानी जीप से उत्तर कर मस्ती से बर्फ में कूदने लगे घुटनों तक नरम नरम बर्फ सब फोटो खींच रहे थे और लेखिका सोच रही थी कि शायद ऐसी ही विभोर कर देने वाली दिव्यता के बीच हमारे ऋषि-मुनियों ने वेदों की रचना की होगी जीवन 1 मूल्यों को खोजा होगा ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ का महामंत्र पाया होगा यह ऐसा सौंदर्य जिसे बड़े से बड़ा अपराधी भी देख ले तो क्षणों के लिए ही सही करुणा का अवतार बुद्ध बन जाए। दूसरी ओर लेखिका की सहेली मणि भी दार्शनिक की तरह कह रही थी- “ये हिम शिखर जल स्तंभ हैं, पूरे एशिया के देखो, प्रकृति भी किस नायाब ढंग से सारा इंतजाम करती है। सर्दियों में बर्फ के रूप में जल संग्रह कर लेती है और गर्मियों में पानी के लिए जब त्राहि-त्राहि मचती है तो ये ही बर्फ शिलाएं पिघल-पिघलकर जलधारा बन हमारे सूखे कंठों को तरावट पहुंचाती हैं कितनी अद्भुत व्यवस्था है जल संचय की ! इस तरह नदियों का कितना उपकार है।

 

थोड़ी दूर ही चीन की सीमा आगे बढ़े, फोज की छावनियाँ दिखाई दीं। थोड़ी दूर पर चीन की सीमा है जहाँ सैनिक माइनस 15 डिग्री सेल्सियस पर पहरा देते हैं। एक सैनिक लेखिका के पूछने पर बता रहा था कि आप चैन की नींद सो सकें, इसीलिए हम यहाँ पहरा देते हैं। लेखिका सोचने लगी कि जिन बर्फीले इलाकों में बैसाख के महीने में पाँच मिनट में हम ठिठुरने लगे तो ये हमारे जवान पौष, माघ के महीने में जब सब कुछ जम जाता है तब कैसे तैनात रहते होंगे?

 

लायुंग से यूमवांग की ओर-लायुंग से यूमयांग की ओर बढ़े। यहाँ एक नया आकर्षण था। ढेरों रूडोडेंड्री और प्रियुता के फूल इन घाटियों में बंदर भी दिखाई दिए यूमयांग पहुँचे मंजिल तक पहुँचने की खुशी थी वहाँ चिप्स बेचती सिक्किमी युवती से पूछा था-क्या तुम सिक्किमी हो तो उसने कहा- “नहीं, में इंडियन हूँ।” यह सुन लेखिका को बहुत अच्छा लगा। वहाँ पहाड़ी कुत्ते भी थे जिन्हें देखकर मणि ने कुत्तों के बारे में बताया कि ये पहाड़ी कुत्ते हैं ये भोंकते नहीं है। ये सिर्फ चांदनी रात में ही भोंकते है। यह सुनकर लेखिका को आश्चर्य हुआ क्या समुद्र की तरह कुत्तों पर भी चाँदनी कामनाओं का ज्वार-भाटा जगाती है। जितेन तरह-तरह की जानकारियाँ देता रहा यहाँ गुरुनानक की थाली से चावल छिटक गए थे यहाँ देवी-देवताओं का निवास है, यहाँ जो गंदगी फैलाएगा वह मर जाएगा। हम लोग यहाँ गंदगी नहीं फैलाते हैं, हम पहाड़, नदी, झरने आदि की पूजा करते हैं। हम गंगटोक नहीं गंतोक कहते हैं। जितेन गंतोक के बारे में बताने लगा कि सिक्किम के भारत में मिलने के बाद कप्तान शेखर दत्ता के सोच के अनुसार घाटियों में रास्ते निकाल कर टूरिस्ट-स्पॉट बनाया है। अभी भी रास्ते बन रहे हैं और नए स्थानों की खोज जारी हैं। लेखिका मन-ही-मन सोचती है कि मनुष्य की असमाप्त खोज का नाम सौंदर्य है।

 

साना साना हाथ जोड़ि पाठ का सार

 

गंतोक (गैंगटॉक) की रात्रि

 

लेखिका को गंतोक (गैंगटॉक) शहर सुबह, शाम और रात, हर समय बहुत अच्छा लगता है। यहाँ की रहस्यमयी सितारों भरी रात लेखिका को सम्मोहित-सी करती प्रतीत होती है। लेखिका ने यहाँ एक नेपाली युवती से प्रार्थना के बोल सीखे थे– “साना-साना हाथ जोड़ि, गर्दहु प्रार्थना। हाम्रो जीवन तिम्रो कौसेली।” जिसका हिंदी में अर्थ है— छोटे-छोटे हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रही हूँ कि मेरा सारा जीवन अच्छाइयों को समर्पित हो।

 

कंचनजंघा के दर्शन की प्रतीक्षा

 

सुबह लेखिका को यूमथांग के लिए निकलना था। जैसे ही उनकी आँख खुलती है, वह बालकनी की ओर भागती है, क्योंकि उन्हें लोगों ने बताया था कि यदि मौसम साफ़ हो, तो बालकनी से भी कंचनजंघा (हिमालय की तीसरी सबसे बड़ी चोटी) दिखाई देती है। उस सुबह मौसम अच्छा होने के बाद भी आसमान हल्के-हल्के बादलों से ढका हुआ था, जिसके कारण लेखिका को कंचनजंघा दिखाई नहीं पड़ी, किंतु सामने तरह-तरह के रंग-बिरंगे ढेर सारे फूल दिखाई दिए ।

 

बौद्ध पताकाओं का यूमथांग में महत्त्व

 

गंतोक (गैंगटॉक) से 149 किमी की दूरी पर यूमथांग था। लेखिका के साथ चल रहे ड्राइवर-कम-गाइड जितेन नार्गे उन्हें बताता है कि यहाँ के सारे रास्तों में हिमालय की गहनतम घाटियाँ और फूलों से लदी मिलेंगी। आगे बढ़ने पर उन्हें एक स्थान पर एक कतार में लगी सफ़ेद बौद्ध पताकाएँ दिखाई देती हैं, नार्गे उन्हें बताता है कि यहाँ बुद्ध की बहुत मान्यता है। जब भी किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु होती है, उसकी आत्मा की शांति के लिए शहर से दूर किसी भी पवित्र स्थान पर एक सौ आठ श्वेत पताकाएँ फहरा दी जाती हैं और इन्हें उतारा नहीं जाता। ये स्वयं ही नष्ट हो जाती हैं।

 

कई बार कोई नया कार्य आरंभ करने पर भी पताकाएँ लगाई जाती हैं, लेकिन ये पताकाएँ सफ़ेद न होकर रंगीन भी होती हैं। लेखिका को यहाँ जगह-जगह पर दलाई लामा की तस्वीर दिखाई देती है। यहाँ तक कि जिस जीप में वह बैठी थी, उसमें भी दलाई लामा का चित्र लगा हुआ था।

 

कवी – लोंग स्टॉक

 

थोड़ा आगे चलने पर ‘कवी- लोंग स्टॉक’ स्थान आता है, जिसे देखते ही जितेन बताता है कि यहाँ ‘गाइड’ फ़िल्म की शूटिंग हुई थी। इसी स्थान पर तिब्बत के चीस-खे बम्सन ने लेपचाओं के शोमेन से कुंजतेक के साथ संधि-पत्र पर हस्ताक्षर किए थे तथा उसकी याद में यहाँ पर एक पत्थर स्मारक के रूप में भी है। लेखिका को एक कुटिया में घूमता हुआ चक्र दिखाई देता है, जिस पर नार्गे उन्हें बताता है कि इसे ‘धर्म चक्र’ कहा जाता है। इसे लोग ‘प्रेयर व्हील’ भी कहते हैं। इसके विषय में यह मान्यता है कि इसे घुमाने से सारे पाप धुल जाते हैं।

 

प्रकृति की मनोरमता

 

कुछ और आगे चलने पर बाज़ार, बस्तियाँ और लोग पीछे छूटने लगे। कहीं-कहीं स्वेटर बुनती नेपाली युवतियाँ और पीठ पर भारी-भरकम कार्टन (गत्ते का बक्सा) ढोते हुए बौने से बहादुर नेपाली मिल रहे थे। ऊपर से नीचे देखने पर मकान बहुत छोटे दिखाई दे रहे थे। अब रास्ते वीरान, सँकरे और जलेबी की तरह घुमावदार होने लगे थे। हिमालय विशालकाय होने लगा था। कहीं पर्वत शिखरों के बीच दूध की धार की तरह झर-झर नीचे गिरते हुए जलप्रपात दिखाई दे रहे थे, तो कहीं चाँदी की तरह चमक मारती तिस्ता नदी, जो सिलीगुड़ी से ही लगातार लेखिका के साथ चल रही थी, बहती हुई दिखाई दे रही थी। अब जीप सेवन सिस्टर्स वॉटर फॉल’ नामक स्थान पर रुकी, जहाँ एक विशाल और सुंदर झरना दिखाई दे रहा था। सैलानियों ने कैमरों से उस स्थान के चित्र लेने शुरू कर दिए। लेखिका यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य में इतना खो गई कि उनका दिल वहाँ से जाने को नहीं कर रहा था।

 

प्रकृति और आगे चलने पर लेखिका को हिमालय की रंग-बिरंगी चोटियाँ नए-नए रूपों में दिखाई देती हैं, जो अचानक बादलों के छा जाने पर ढक जाती हैं। धीरे-धीरे धुंध की चादर के छूट जाने पर उन्हें दो विपरीत दिशाओं से आते छाया पहाड़ दिखाई देते हैं, जो अब अपने श्रेष्ठतम रूप में उनके सामने थे। इस स्थान को देखकर लेखिका को ऐसा लगता है मानो स्वर्ग यहीं पर है। वहाँ पर लिखा था-‘ -‘थिंक ग्रीन’ जो प्रकृति और पर्यावरण के प्रति सजग होने की बात कह रहा था। लेखिका वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य से इतना प्रभावित होती है कि जीप के कुछ देर वहाँ रुकने पर वह थोड़ी दूर तक पैदल ही वहाँ के सौंदर्य को निहारने लगती है। उनकी यह मुग्धता पहाड़ी औरतों द्वारा पत्थरों को तोड़ने की आवाज़ से टूटती है।

 

भूख, मौत और जीवित रहने की जंग में शामिल स्त्रियाँ

 

लेखिका को यह देखकर बहुत दुःख हुआ कि इतने सुंदर तथा प्राकृतिक स्थान पर भी भूख, मौत और जीवित रहने की जंग चल रही थी। वहाँ पर बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन के एक कर्मचारी ने बताया कि जिन सुंदर स्थानों का दर्शन करने वह जा रही हैं, यह सब इन्हीं पहाड़ी महिलाओं द्वारा बनाए जा रहे हैं। यह काम इतना खतरनाक है कि जरा भी ध्यान चूका तो मौत निश्चित है। लेखिका को ध्यान आया कि एक स्थान पर सिक्किम सरकार का लगाया हुआ बोर्ड उन्होंने पढ़ा था, जिसमें लिखा था- ‘एवर वंडर्ड हू डिफाइंड डेथ टू बिल्ड दीज़ रोड्स।’ इसका हिंदी अनुवाद था- आप आश्चर्य करेंगे कि इन रास्तों को बनाने में लोगों ने मौत को झुठलाया है। वास्तव में कितना कम लेकर भी ये पहाड़ी स्त्रियाँ समाज को कितना अधिक वापस कर देती हैं।

 

पहाड़ी जीवन की कठोरता

 

जब जीप और ऊँचाई पर पहुँची तो सात-आठ वर्ष की उम्र के बहुत सारे बच्चे स्कूल से लौट रहे थे। जितेन (गाइड) उन्हें बताता है कि यहाँ तराई में ले-देकर एक ही स्कूल है, जहाँ तीन-साढ़े तीन किलोमीटर की पहाड़ी चढ़कर ये बच्चे स्कूल जाते हैं। पढ़ाई के अतिरिक्त ये बच्चे शाम के समय अपनी माँ के साथ मवेशियों को चराते हैं, पानी भरते हैं और जंगल से लकड़ियों के भारी-भारी गट्ठर ढोते हैं।

 

लायुंग के प्राकृतिक दृश्य

 

यूमथांग पहुँचने के लिए लायुग में जिस मकान में लेखिका व उनके सहयात्री ठहरे थे, वह तिस्ता नदी के किनारे लकड़ी का एक छोटा-सा घर था। वहाँ का वातावरण देखकर उन्हें लगा कि प्रकृति ने मनुष्य को सुख-शांति, पेड़-पौधे, पशु सभी कुछ दिए हैं, किंतु हमारी पीढ़ो ने प्रकृति की इस लय ताल और गति से खिलवाड़ करके अक्षम्य (क्षमा के योग्य न होने वाला) अपराध किया है। लायुंग की सुबह बेहद शांत और सुरम्य थी। वहाँ के अधिकतर लोगों की जीविका का साधन पहाड़ी आलू, धान की खेती और दारू का व्यापार है। लेखिका सुबह अकेले ही पहाड़ों की बर्फ़ देखने निकल जाती हैं, परंतु वहाँ ज़रा भी बर्फ़ नहीं थी। लायुंग में एक सिक्किमी नवयुवक उन्हें बताता है कि प्रदूषण के चलते यहाँ बर्फबारी (स्नो-फॉल) लगातार कम होती जा रही है।

 

भारत का स्विट्ज़रलैंड

 

बर्फ़बारी देखने के लिए लेखिका अपने सहयात्रियों के संग लायुंग से 500 फीट की ऊँचाई पर स्थित ‘कटाओ’ नामक स्थान पर जाती हैं। इसे भारत का स्विट्ज़रलैंड कहा जाता है। ‘कटाओ’ जाने का मार्ग बहुत दुर्गम था। सभी सैलानियों की साँसे रुकी जा रही थीं। रास्ते धुँध और फिसलन से भरे थे, जिनमें बड़े-बड़े शब्दों में चेतावनियाँ लिखी थीं— ‘इफ यू आर मैरिड, डाइवोर्स स्पीड’, ‘दुर्घटना से देर भली, सावधानी से मौत टली ।’

 

कटाओ की सुंदरता

 

कटाओ पहुँचने के रास्ते में दूर से ही बर्फ से ढके पहाड़ दिखाई देने लगे थे। पहाड़ ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने उन पर पाउडर छिड़क दिया हो या साबुन के झाग चारों ओर फैला दिए हों। सभी यहाँ बर्फ़ पर कूदने लगे थे। लेखिका को लगा शायद ऐसी ही विभोर कर देने वाली दिव्यता के बीच हमारे ऋषि-मुनियों ने वेदों की रचना की होगी और जीवन के गहन सत्यों को खोजा होगा।

 

लेखिका की मित्र मणि एकाएक दार्शनिकों की तरह कहने लगीं, “ये हिमशिखर जल स्तंभ हैं, पूरे एशिया के देखो, प्रकृति भी किस नायाब ढंग से इंतज़ाम करती है। सर्दियों में बर्फ के रूप में जल संग्रह कर लेती है और गर्मियों में पानी के लिए जब त्राहि-त्राहि मचती है, तो ये ही बर्फ शिलाएँ पिघल-पिघलकर जलधारा बन हमारे सूखे कंठों को तरावट पहुँचाती हैं। कितनी अद्भुत व्यवस्था है जल संचय की!”

 

सैनिकों की वीरता के किस्से

 

वहाँ से आगे बढ़ने पर उन्हें मार्ग में इक्की-दुक्की फ़ौजी छावनियाँ दिखाई 1 देती हैं। वहाँ से थोड़ी ही दूरी पर चीन की सीमा थी। जब लेखिका ने एक फ़ौजी से पूछा कि इतनी कड़कड़ाती ठंड (उस समय तापमान 15° सेल्सियस था) में आप लोगों को बहुत तकलीफ़ होती होगी, तो उसने उत्तर दिया – “आप चैन की नींद सो सकें, इसीलिए तो हम यहाँ पहरा दे रहे हैं।” थोड़ी दूर एक फौज़ी छावनी पर लिखा था- ‘वी गिव अवर टुडे फॉर योर टुमारो ।’ लेखिका को भारतीय सैनिकों पर बहुत गर्व होता है। वह सोचने लगती है कि पौष और माघ के महीनों में जब केवल पेट्रोल को छोड़कर सब कुछ जम जाता है, उस समय भी ये सैनिक हमारी रक्षा के लिए दिन-रात लगे रहते हैं। यूमथांग की घाटियों में ढेरों प्रियुता और रूडोडेंड्रो के फूल खिले हुए थे। जितेन उन्हें बताता है कि अगले पंद्रह दिनों में पूरी घाटी फूलों से भर उठेगी।

 

सिक्किम में भारत प्रेम

 

लेखिका यूमथांग में चिप्स बेचती हुई एक युवती से पूछती है— ‘क्या तुम सिक्किमी हो?’ वह युवती उत्तर देती है— ‘नहीं, मैं इंडियन हूँ।’ लेखिका को यह जानकर बहुत प्रसन्नता होती है कि सिक्किम के लोग भारत में मिलकर बहुत प्रसन्न हैं।

 

सिक्किम से जुड़ी लोक मान्यताएँ

 

जब लेखिका तथा उनके साथी जीप में बैठ रहे थे, तब एक पहाड़ी कुत्ते ने रास्ता काट दिया। लेखिका की साथी मणि बताती है कि ये पहाड़ी कुत्ते हैं, जो केवल चाँदनी रात में ही भौंकते हैं। वापस लौटते हुए जितेन उन्हें जानकारी देता है कि यहाँ पर एक पत्थर है, जिस पर गुरुनानक के पैरों के निशान हैं। कहा जाता है कि यहाँ गुरुनानक की थाली से थोड़े से चावल छिटककर बाहर गिर गए थे और जिस स्थान पर चावल छिटक गए थे, वहाँ चावल की खेती होती है।

 

खेदुम का महत्त्व

 

जितेन उन्हें बताता है कि तीन-चार किलोमीटर आगे ‘खेदुम’ नामक एक स्थान पर देवी-देवताओं का निवास है। सिक्किम के लोगों का विश्वास है, जो यहाँ गंदगी फैलाता है, उसकी मृत्यु हो जाती है। लेखिका के पूछने पर कि क्या तुम लोग पहाड़ों पर गंदगी नहीं फैलाते, तो वह उत्तर देता है — नहीं मैडम, हम लोग पहाड़, नदी, झरने इन सबकी पूजा करते हैं । जितेन यूमथांग के विषय में एक जानकारी और देता है कि जब सिक्किम में भारत में मिला तो उसके कई वर्षों बाद भारतीय सेना के कप्तान शेखर दत्ता के दिमाग में यह विचार आया कि केवल सैनिकों को यहाँ रखकर क्या होगा, घाटियों के बीच रास्ते निकालकर इस स्थान को टूरिस्ट स्पॉट बनाया जा सकता है। आज भी यहाँ रास्ते बनाए जा रहे हैं। लेखिका सोचती है कि नए-नए स्थानों की खोज अभी भी जारी है और शायद मनुष्य की कभी न समाप्त होने वाली खोज का नाम सौंदर्य है। one

 

शब्दार्थ

 

पृष्ठ संख्या 17

 

अतींद्रियता-इंद्रियों से परे उजास प्रकाश उजाला सम्मोहन मोहित होना।

 

पृष्ठ संख्या 18

 

कपाट-दरवाजा रकम रकम-तरह-तरह के अवधारणाएँ सोच, विचार। पृष्ठ संख्या 19

 

रफ्ता-रफ्ता-धीरे-धीरे ओझल दृष्टि से परे बीरान-सुनसान विशालकाय-बड़े आकार का

 

पृष्ठ संख्या 20

 

मुंडकी- सिर जलप्रपात झरना। पराकाष्ठा चरमसीमा मशगूल-व्यस्त अभिशप्त-शापित, जिसे शाप मिल चुका’ हो । सरहदों- सीमाओं। शिद्दत प्रबलता तामसिकताएँ-बुरी भावनाओं से युक्त, तमोगुण से युक्त कुटिल अनमनी-उदास नजारे दृश्य।

 

पृष्ठ संख्या 21 सतत – निरंतर, लगातार वासनाएँ-बुरी इच्छाएँ। तंद्रिल-अवस्था नींद की स्थिति में सयानी चतुर, समझदार जन्नत-स्वर्ग चेरवेति-चैरवेति-चलते रहो, चलते रहो वजूद अस्तित्व औकात।

 

पृष्ठ संख्या 22

 

संजीदा सावधान, गंभीर चूकभूल

 

पृष्ठ संख्या 23

 

हाथों में पड़े टाढ़े हाथों में पढ़ने वाली गाँठे गमहीन-उदासीन, दुख से रहित गमगीन दुखी बेस्ट एंड रिपेइंग-कम लेना और ज्यादा देना वर्षीला-बढ़े हुए पेट वाला 1

 

पृष्ठ संख्या 24

 

सात्विक शुद्ध, पवित्र आमा-चमक असहय-जो सहन न हो सके। मधिम-मधिम-धीमे-धीमे परिंदे-पक्षी।

 

पृष्ठ संख्या 25

 

हलाहल विष, जहर संक्रमण-संयोग, मिलन सुर्खियों में चर्चा में गुड़प-निगल लिया।

 

पृष्ठ संख्या 26

 

विभोर-आनंद में डूब जाना वृत्तिजीविका रामरोठो अच्छा है।

 

पृष्ठ संख्या 27

 

ख्वाहिश- इच्छा, अभिलाषा टूरिस्ट स्पॉट-भ्रमण स्थल विभोर प्रसन्न ठगा सा रह जाना आश्चर्य चकित रह जाना। नायाब -अद्वितीय। लम्हों- क्षणों बॉर्डर एरिया सीमावर्ती क्षेत्र मियाद सीमा, अवधि।

 

पृष्ठ संख्या 28

 

फला-फूला- उन्नत अवस्था में आबोहवा- जलवायु

 

पृष्ठ संख्या 29

 

विस्मय आश्चर्य से फुट-प्रिंट-पैरों के चिह्न

 

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