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मानवीय करुणा की दिव्य चमक |मानवीय करुणा की दिव्य चमक पाठ का सारांश

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मानवीय करुणा की दिव्य चमक पाठ की रूपरेखा

 

संस्मरण स्मृतियों से बनता है और स्मृतियों की विश्वसनीयता उसे महत्वपूर्ण बनाती है। फ़ादर कामिल बुल्के पर लिखा सर्वेश्वर का यह संस्मरण इस कसौटी पर खरा उतरता है। अपने को भारतीय कहने वाले फ़ादर बुल्के जन्मे तो बेल्जियम (यूरोप) के रैमार्चपल शहर में जो गिरजों, पादरियों, धर्मगुरुओं और संतों की भूमि कही जाती है, परंतु उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाया भारत को फ़ादर बुल्के एक संन्यासी थे, परंतु पारंपरिक अर्थ में नहीं सर्वेश्वर का फ़ादर बुल्के से अंतरंग संबंध था, जिसकी झलक हमें इस संस्मरण में मिलती है। लेखक का मानना कि जब तक रामकथा है, इस विदेशी भारतीय साधु को याद किया जाएगा तथा उन्हें हिंदी भाषा है और बोलियों के अगाध प्रेम का उदाहरण माना जाएगा।

 

मानवीय करुणा की दिव्य चमक पाठ का सारांश

 

प्रस्तुत पाठ सर्वेश्वर दयाल सक्सेना द्वारा लिखित एक उच्चकोटि का संस्मरण है, जिसमें फादर कामिल बुल्के की चारित्रिक और व्यावहारिक विशेषताएं वर्णित हैं। बेल्जियम में जन्मे फादर बुल्के ऐसी भूमि से भारत आए जो गिरजायरों, पादरियों, धर्मगुरुओं और संतों की पावन भूमि कही जाती है। उन्होंने भारत आने के बाद से मृत्युपर्यंत तक इसे अपना कर्म-क्षेत्र बनाए रखा फादर संन्यासी थे, परंतु परंपरागत नहीं लेखक और फादर के संबंधों की झलक हमें इस संस्मरण में मिलती है। वे भारतीय संस्कृति में रच-बस गए और हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने का सराहनीय प्रयास किया।

 

फ़ादर बुल्के के निधन पर लेखक का आक्रोश-लेखक फादर के निधन पर अफसोस करते हुए ईश्वर से प्रश्न करता है कि जिसके रंगों में मिठास भरे अमृत के अतिरिक्त और कुछ नहीं था, उसके लिए ईश्वर ने ऐसा जहर का विधान क्यों किया? फ़ादर को मृत्यु जहरबाद के कारण कठिन यातना सहते हुए हुई थी जिसने इतनी ममता, इतना अपनत्व इस साधु में अपने प्रियजन के प्रति भरा था, उसने फिर ऐसे साधु के लिए ऐसी यातना भरी मीत क्यों दी? लेखक आज भी फ़ादर की स्नेहमयी बाहों का दबाव अपनी छाती पर महसूस करता है।

 

फादर बुल्के को आत्मीयता और लेखक-लेखक के लिए फादर बुल्के को याद करना शांत संगीत सुनने जैसा लगता था, उनको देखना निर्मल जल में स्नान करने जैसा था और उनसे बातें करना कर्म को संकल्प से भरने जैसा था लेखक स्मृतियों में डूब जाता है। वे पारिवारिक रिश्ते में बंधे थे। वे हमारी हंसी-मजाक में शामिल रहते थे, हमारी गोष्ठियों में गंभीर बहस करते थे, हमारी रचनाओं पर बेबाक राय और सुझाव देते थे, हमारे घरों के किसी भी उत्सव और संस्कार में बड़े भाई की तरह खड़े रहते थे और पुरोहितों की तरह आशीष देते थे।

 

लेखक ने उन्हें कभी क्रोध में नहीं देखा अपितु सदैव ममता और प्यार से लबालब छलकता महसूस किया। उन्हें देखकर लेखक के मन में यह जिज्ञासा सदैव बनी रही कि बेल्जिमय में इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में पहुंचकर फ़ादर बुल्के के मन में संन्यासी बनने की इच्छा कैसे जाग गई जबकि उनका भरा-पूरा पर था

 

फ़ादर बुल्के का परिवार-लेखक प्रायः अपनी बातों में उनसे पूछता था कि अपने देश की याद आती है तो अकसर यही कहते थे कि मेरा देश तो अब भारत है। हाँ, जन्मभूमि रेम्स चैंपल की याद आती है। माँ को बहुत याद आती है। वे अक्सर माँ की स्मृति में डूब जाते थे। माँ की चिट्ठियाँ उनके पास आया करती थीं, जिन्हें अपने मित्र डॉ. रघुवंश को दिखाया करते थे। उनका पिता और भाइयों के प्रति बहुत लगाव नहीं था। पिता व्यवसायी थे। एक भाई पादरी हो गया था। एक भाई काम करता था। एक बहन थी जो सख्त और जिद्दी थी। फादर को कभी उसकी चिंता करते नहीं देखा था।

 

भारत में बस जाने के बाद दो-तीन बार अपने परिवार से मिलने के लिए बेल्जियम गए थे। “आप सब छोड़कर क्यों चले आए?” यह पूछने पर वे सरलता से उत्तर देते कि प्रभु की इच्छा थी। वे बताते थे कि माँ ने बचपन में ही • घोषित कर दिया था कि तड़का हाथ से गया और सचमुच इंजीनियरिंग की अंतिम वर्ष की पढ़ाई छोड़कर संन्यासी होने के लिए धर्म गुरु के पास गए और कहा कि में संन्यास लेना चाहता हूँ और शर्त रखी कि में भारत जाऊँगा भारत जाने की इच्छा का कारण पूछने पर उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की।

 

लेखक की शिकायत

 

लेखक को ईश्वर से शिकायत है कि जिस फ़ादर की रंगों में सभी व्यक्तियों के लिए मिठास भरे अमृत के अतिरिक्त और कुछ नहीं था, उसके लिए ईश्वर ने जहरबाद (एक तरह का ज़हरीला फोड़ा) का विधान क्यों किया? फ़ादर ने अपना जीवन प्रभु की आस्था और उपासना में बिताया, लेकिन अंतिम समय में उन्हें अत्यधिक शारीरिक यातना सहनी पड़ी। लेखक को पादरी के सफेद चोगे से ढकी आकृति, गोरा रंग, सफेद झाँई मारती भूरी दाढ़ी, नीली आँखे तथा गले लगाने को आतुर फ़ादर बहुत याद आते हैं।

 

फ़ादर कामिल बुल्के और ‘परिमल’ के दिन लेखक को ‘परिमल’ के वे दिन याद आते हैं, जब वे सभी एक पारिवारिक रिश्ते में बंधे हुए थे, जिसके सबसे बड़े सदस्य फ़ादर थे। जब सभी हँसी मज़ाक करते, तो फ़ादर उसमें निर्लिप्त शामिल रहते। गोष्ठियों में वह गंभीर बहस करते और सबकी रचनाओं पर बेबाक राय देते। लेखक तथा उसके मित्रों के घरों में किसी भी उत्सव अथवा संस्कार में वह बड़े भाई या पुरोहित की तरह खड़े होकर उन्हें आशीषों से भर देते थे। लेखक को अपने बच्चे का वह संस्कार याद आता है, जब फ़ादर ने उसके मुख में पहली बार अन्न डाला था। लेखक को उस समय उनकी नीली आँखों में तैरती हुई वात्सल्य की भावना ऐसी लगती है, जैसे वह किसी ऊँचाई पर देवदार की छाया में खड़ा हो ।

 

फ़ादर की मातृभूमि एवं उनका परिवार

 

फ़ादर जब बेल्जियम में इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में थे, तब उनके मन में संन्यासी बनने की इच्छा जागी, जबकि उस समय उनके परिवार में दो भाई, एक बहन माँ और पिता सभी थे। उनकी जन्मभूमि का नाम रेम्सचंपल था। उन्हें अपनी माँ की बहुत याद आती थी। फ़ादर अपने अभिन्न मित्र डॉ. रघुवंश को अपनी माँ की चिट्ठियाँ दिखाया करते थे। उनका एक भाई वहीं पादरी हो गया था और एक भाई काम करता था। उनके पिता व्यवसायी थे और बहन ज़िद्दी थी, जिसके विवाह के लिए वह चितित रहते थे। भारत में बस जाने बाद दो या तीन बार वह अपने परिवार से मिलने बेल्जियम भी गए थे।

 

फ़ादर की भारत में शिक्षा, रोज़गार और जीवन यापन

 

फ़ादर जब इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में थे, तो वह धर्म गुरु के पास जाकर बोले कि मैं संन्यास लेना चाहता हूँ। संन्यास लेने से पहले उन्होंने एक शर्त रखी कि वह भारत जाएँगे। उनकी यह शर्त मान ली गई और वह भारत आ गए। पहले ‘जिसेट संघ’ में दो साल तक पादरियों के बीच रहकर उन्होंने धर्माचार का अध्ययन किया और इसके बाद 9-10 वर्ष तक दार्जिलिंग में पढ़ाई की। कोलकाता से बी. ए. करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद से एम. ए. किया। उन दिनों डॉ. धीरेंद्र वर्मा हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे। फ़ादर ने वर्ष 1950 में प्रयाग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में रहकर ‘रामकथा: उत्पत्ति और विकास’ नामक विषय पर शोध पूरा किया। ‘परिमल’ में उनके अध्याय पढ़े गए। उन्होंने मातरलिंक के प्रसिद्ध नाटक ‘ब्लू बर्ड’ का ‘नीलपंछी’ के नाम से पांतर भी किया। बाद में वह सेंट जेवियर्स कॉलेज, राँची में हिंदी तथा संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष हो गए। इसके बाद वह दिल्ली आए और 47 वर्ष देश में रहकर 73 वर्ष का जीवन जीने के बाद पंचतत्त्व में विलीन हो गए।

 

फ़ादर की मृत्यु

 

18 अगस्त, 1982 की सुबह दस बजे का समय था, जब दिल्ली में कश्मीरी गेट के निकलसन कब्रगाह में उनका ताबूत एक छोटी-सी नीली गाड़ी में से उतारकर एक लंबी सँकरी, उदास पेड़ों की घनी छाँव वाली सड़क से कब्रगाह के आखिरी छोर तक ले जाया गया, जहाँ धरती की गोद में सुलाने के लिए कब्र खुदी हुई थी। फ़ादर की देह को कब्र के ऊपर लिटाकर मसीही विधि से अंतिम संस्कार शुरू हुआ। वहाँ पर उपस्थित कई लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की, जिसमें सेंट जेवियर्स के रेक्टर फ़ादर पास्कल ने उनके जीवन और कर्म पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा – “फ़ादर बुल्के धरती में जा रहे हैं। इस धरती से ऐसे रत्न और पैदा हों।” इसके बाद उनकी देह को कब्र में उतार दिया गया। फ़ादर को यह पता नहीं था कि उनकी मृत्यु पर कोई रोएगा, किंतु उस क्षण उनके लिए रोने वालों की कमी नहीं थी । लेखक कहते हैं कि फ़ादर बुल्के ‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ थे। लेखक के अनुसार, फ़ादर सबसे अधिक फल-फूल वाले सुगंधित छायादार वृक्ष थे, जिनकी यादें हम सबके मन में हमेशा बनी रहेगी।

 

फ़ादर की अंग्रेज़ी – हिंदी शब्दकोश

 

फ़ादर ने सेंट जेवियर्स कॉलेज में रहते हुए ‘अंग्रेज़ी- हिंदी शब्दकोश’ तैयार किया और बाइबिल का अनुवाद भी किया। फ़ादर को हिंदी के विकास और उसे राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की बहुत चिंता थी। वह अपनी इस चिंता को हर मंच पर प्रदर्शित किया करते थे। शायद हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचारित करने का प्रश्न एक ऐसा प्रश्न था, जिस पर वह कभी-कभी झुंझला उठते थे। उन्हें इस बात पर बहुत दुःख होता था कि हिंदी वाले ही हिंदी भाषा की उपेक्षा करते हैं। jeet

 

शब्दार्थ

 

यहाँ दी गई पृष्ठ संख्याएँ NCERT पाठ्यपुस्तक ( क्षितिज भाग-2) के अनुसार हैं।

 

पृष्ठ 85

 

• जहरबाद- गैंग्रीन नामक भयंकर बीमारी / एक तरह का जहरीला फोड़ा; विधान-नियम, आस्था- विश्वास यातना-पीड़ा, देहरी- दहलीज़, पादरी- ईसाई धर्म का पुजारी आतुर-बे अपनत्व – अपनापन; साक्षी- गवाह; संकल्प-निश्चय; – बेचैन परिमल – साहित्यिक संस्था का नाम निर्लिप्त- जो शामिल न हो, गोष्ठी- विचार के लिए बुलाई गई सभा, बेबाक राय स्पष्ट विचार, वात्सल्य – बच्चों के प्रति दिखाया जाने वाला प्यार; आवेश-जोश; लबालब पूरी तरह स्मृति- याद; अभिन्न-घनिष्ठ; व्यवसायी- व्यापारी; हाथ से जाना-वश में न होना; धर्माचार धर्म का पालन या आचरण करना।

 

पृष् 87

 

शोध प्रबंध-खोज या रिसर्च करने के बाद लिखी गई पुस्तक; रूपांतर – अनुवाद; अकाट्य-जिसे काटा न जा सके; सांत्वना दिलासा देना; विरल- कम मिलने वाली; ताबूत-शव को रखने वाला बक्सा थिर-स्थिर सँकरी – तंग करील झाड़ी के रूप में उगने वाला एक कंटीला पौधा, गैरिक वसन- साधुओं द्वारा पहने जाने वाले गेरुए कपड़े।

 

पष्ठ 88

 

अपरिचित-अनजान; आहट- किसी के आने से उत्पन्न मंद ध्वनि; सिमट- एकत्रित होना; अनुकरणीय – जिसके पीछे-पीछे चला जा सके; स्याही फैलाना- जिसे लिखा न जा सके, किंतु फिर भी प्रयास करना।

 

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